तेलंगाना का चौंकाने वाला सर्वे: 12 लाख लोगों की कोई जाति ही नहीं!

तेलंगाना का चौंकाने वाला सर्वे: 12 लाख लोगों की कोई जाति ही नहीं!

तेलंगाना के सामाजिक सर्वेक्षण में बड़ा खुलासा: 12 लाख लोगों ने खुद को बताया ‘जाति मुक्त’

तेलंगाना द्वारा साल 2024 में कराए गए सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक, रोजगार, राजनीतिक और जाति (SEEEPC) सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की कुल आबादी का करीब 3.4 फीसदी हिस्सा, यानी लगभग 11.96 लाख लोगों ने खुद को ‘बिना जाति’ का बताया है। इस बड़ी संख्या के कारण यह समूह राज्य का 10वां सबसे बड़ा समुदाय बनकर उभरा है। इस रुझान को एक सामाजिक घटना के रूप में देखा जा रहा है, जो मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों, विशेषकर ग्रेटर हैदराबाद के आसपास केंद्रित है।

सुविधा बनाम पहचान का विरोधाभास

सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि जाति-पहचान को न मानने वाले अधिकांश लोग बेहतर शिक्षा, उच्च वेतन वाली नौकरी और अच्छी आर्थिक स्थिति वाले वर्गों से आते हैं। यह वर्ग जाति आधारित सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से काफी हद तक सुरक्षित है। हालांकि, तकनीकी रूप से इन्हें ‘अन्य जातियां’ (OC) श्रेणी में रखा गया है, लेकिन विरोधाभास यह है कि इनमें से 43.3% लोगों के पास अब भी जाति प्रमाण पत्र मौजूद हैं। ये लोग अपनी पहचान के तौर पर भले ही जाति को नकारते हों, लेकिन सरकारी योजनाओं, शिक्षा और नौकरियों जैसे पैतृक लाभों के लिए वे आज भी अपने इन दस्तावेजों का उपयोग करते हैं।

सर्वेक्षण का निहितार्थ

इस सर्वे का मूल प्रभाव यह है कि यह जाति व्यवस्था के प्रति बदलते दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। प्रशासनिक तंत्र और सामाजिक वास्तविकता के बीच बने इस फासले से यह संकेत मिलता है कि समाज का एक बड़ा वर्ग जातिगत पहचान से खुद को मुक्त करना चाहता है, लेकिन व्यावहारिक जरूरतों और आरक्षण आधारित व्यवस्थाओं के कारण वे पूरी तरह इन प्रमाणों से अलग नहीं हो पा रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि व्यक्ति भले ही अपनी सामाजिक पहचान को निजी तौर पर स्वीकार न करे, मगर वर्तमान प्रशासनिक ढांचे में लाभ प्राप्त करने के लिए जातिगत दस्तावेज अभी भी एक अनिवार्य माध्यम बने हुए हैं।

एक नजर में

  • तेलंगाना के नए सर्वे में करीब 12 लाख लोगों ने अपनी जाति ‘कोई नहीं’ दर्ज कराई है।
  • ये लोग मुख्य रूप से समृद्ध, शिक्षित और शहरी (हैदराबाद) निवासी हैं।
  • पहचान के रूप में जाति को नकारने के बावजूद, इनमें से 43 फीसदी से अधिक लोगों के पास जाति प्रमाण-पत्र मौजूद हैं।
  • प्रशासनिक रूप से इस समूह को सामान्य वर्ग (OC) की श्रेणी में रखा गया है।

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