भारत की विदेश नीति पर बढ़ते सवाल
अमेरिका और रूस के रिश्तों में खिंचाव का असर अब भारत पर दिखने लगा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने चेतावनी दी है कि यदि अलास्का वार्ता विफल रहती है तो भारत पर 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगाया जा सकता है। इस बयान के बाद विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि क्या भारत की मल्टी-अलाइनमेंट विदेश नीति अपने लक्ष्य पूरे करने में असफल हो रही है।
फ्रांसीसी विश्लेषक अरनॉड बरट्रैंड का मानना है कि भारत सबके साथ मित्रता रखने की रणनीति से “प्रेशर वॉल्व” बन गया है। वहीं भारत के पूर्व राजदूत जावेद अशरफ़ का कहना है कि “भारत ने अपने हितों से समझौता नहीं किया है। चीन और रूस की तरह भारत भी रणनीतिक स्वायत्तता पर टिके रहना चाहता है।” इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया चीन दौरा चर्चा का केंद्र बन गया है, जिसे कई लोग अमेरिका से बिगड़ते संबंधों की प्रतिक्रिया मान रहे हैं।
हालाँकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत और चीन दोनों एक-दूसरे के लिए आर्थिक रूप से ज़रूरी हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2024 में भारत ने चीन से 48 अरब डॉलर मूल्य का इलेक्ट्रॉनिक और फ़ार्मा कच्चा माल आयात किया। ऐसे में भारत के सामने चुनौती है कि वह अमेरिका के साथ व्यापारिक टकराव से बचते हुए चीन से रिश्तों को संतुलित करे। विश्लेषकों के अनुसार, भारत को आने वाले समय में अपनी विदेश नीति और मज़बूत करनी होगी ताकि वैश्विक दबावों का प्रभाव कम किया जा सके।
