सूखती गंगा और 85 करोड़ लोगों का संकट, पिछले 1300 सालों में सबसे बुरा दौर

सूखती गंगा और 85 करोड़ लोगों का संकट, पिछले 1300 सालों में सबसे बुरा दौर

देश की जीवनधारा मानी जाने वाली गंगा नदी जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले 1300 वर्षों में गंगा की स्थिति इतनी चिंताजनक कभी नहीं रही। ताजा शोध बताते हैं कि गंगा का जलस्तर औसतन 1.5 से 2 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की दर से कम हो रहा है। दक्षिण एशिया के लगभग 85 करोड़ लोगों का जीवन और आजीविका सीधे तौर पर इस नदी पर टिकी है, जिनके भविष्य पर अब सूखे का गहरा साया मंडरा रहा है।

अस्तित्व पर संकट के मुख्य कारण

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 1991 से 2020 तक के तीन दशक गंगा बेसिन के इतिहास में सबसे शुष्क रहे हैं। इस गिरावट के पीछे ग्लोबल वार्मिंग, मानसून के पैटर्न में बदलाव, भूजल का अत्यधिक दोहन और अवैज्ञानिक बांध निर्माण जैसे प्रमुख कारण हैं। ‘पैलियोक्लाइमेटोलॉजिस्ट’ द्वारा किए गए ऐतिहासिक विश्लेषणों से पता चलता है कि 1991 में अचानक नदी के प्रवाह में प्रति सेकंड 620 घन मीटर की भारी कमी आई, जो पहले कभी नहीं देखी गई थी।

कृषि और जनजीवन पर प्रभाव

नदी के सूखने का सबसे गंभीर असर कृषि, पेयजल आपूर्ति और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है। आईआईटी गांधीनगर के विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण जमीन और समुद्र के तापमान का अंतर कम हो गया है, जिससे मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ गई हैं। इसका सीधा परिणाम गंगा बेसिन में बारिश की कमी के रूप में सामने आया है। जलस्तर गिरने से सिंचाई के लिए पानी का संकट बढ़ गया है, जिससे खाद्य उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा, जो नदी मार्ग कभी नौकायन के लिए प्रमुख थे, अब वहां परिवहन लगभग असंभव हो गया है।

एक झलक में

  • गंगा का जलस्तर हर साल औसतन 1.5 से 2 सेमी कम हो रहा है, जिससे 85 करोड़ लोगों पर खतरा है।
  • वर्ष 1991 से 2020 तक का समय पिछले 1300 वर्षों में गंगा के लिए सबसे शुष्क काल रहा है।
  • ग्लोबल वार्मिंग और कमजोर मानसून को नदी के प्रवाह में कमी का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।
  • नदी के सूखने से दक्षिण एशिया के एक बड़े हिस्से में खाद्य सुरक्षा और पेयजल का गंभीर संकट पैदा हो सकता है।