बोली लगाकर मिलती है दुकान की अनुमति! जानिए 1 महीने तक खराब न होने वाली इस चमत्कारी जलेबी का राज

बोली लगाकर मिलती है दुकान की अनुमति! जानिए 1 महीने तक खराब न होने वाली इस चमत्कारी जलेबी का राज

मेले का नाम आते ही मन में तरह-तरह की दुकानें, झूला और चटपटे व्यंजनों की तस्वीर उभर जाती है। दुर्गा पूजा और लक्ष्मी पूजा के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह के मेले लगते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम जिले के जंगलमहल में एक ऐसा अनूठा मेला लगता है, जिसका मुख्य आकर्षण सिर्फ एक ही चीज है—जलेबी। ‘झाड़ग्राम जलेबी मेला’ के नाम से मशहूर इस पारंपरिक उत्सव में शामिल होने के लिए हर साल हजारों लोग बेताब रहते हैं। इस अनोखी जलेबी का स्वाद चखने के लिए न केवल स्थानीय लोग, बल्कि पड़ोसी जिलों और दूसरे राज्यों से भी भारी भीड़ उमड़ती है।

झाड़ग्राम के बिनपुर के हरदा गांव में लक्ष्मी पूजा के उपलक्ष्य में यह विशेष मेला आयोजित किया जाता है। हैरानी की बात यह है कि इस विशाल मेले में अन्य कई दुकानें लग सकती हैं, लेकिन जलेबी की दुकान सिर्फ एक ही होती है। उस एकमात्र दुकान को हासिल करने की प्रक्रिया भी काफी दिलचस्प है। इसके लिए कोई आम अनुमति नहीं मिलती, बल्कि पूरी पारदर्शिता के साथ बोली (नीलामी) लगाई जाती है, जिसके बाद ही दुकान का ठेका मिलता है। इसके साथ ही एक कड़ा नियम भी जुड़ा हुआ है। पुरानी परंपरा के अनुसार, साहा और मंडल परिवार के सदस्यों के अलावा कोई और व्यक्ति इस मेले में जलेबी की दुकान नहीं लगा सकता है। इस साल सिंटू साहा नामक व्यक्ति ने 3 लाख 91 हजार रुपये की बोली लगाकर इस प्रतिष्ठित दुकान का ठेका हासिल किया है।

इस मेले में मिलने वाली जलेबी का स्वाद और उसे बनाने की विधि आम जलेबियों से बिल्कुल अलग होती है। जहां सामान्य तौर पर जलेबी मैदे से बनाई जाती है, वहीं हरदा गांव की यह खास जलेबी एक गुप्त और पारंपरिक विधि से तैयार होती है। इसमें उड़द (बिउली) दाल के पाउडर में बासमती या अतप चावल का आटा मिलाकर एक विशेष घोल तैयार किया जाता है। स्वाद में लाजवाब होने के साथ-साथ इस जलेबी की सबसे बड़ी खासियत इसकी शेल्फ लाइफ है। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह जलेबी आम मिठाइयों की तरह जल्दी खराब नहीं होती। इसे घर लाकर लगभग एक महीने तक सुरक्षित रखकर खाया जा सकता है, और इसका स्वाद वैसा का वैसा ही बना रहता है।

जलेबी की भारी मांग होने के बावजूद इसके दाम आसमान नहीं छूते। कीमत तय करने में दुकानदार की मनमानी का कोई स्थान नहीं होता है, बल्कि दाम पूरी तरह से पूजा कमेटी द्वारा तय किए जाते हैं। हर साल एक तय और किफायती दर पर ही यह जलेबी बेची जाती है। पिछले वर्षों में यह जलेबी 100 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकती थी, लेकिन इस साल बाजार में महंगाई को देखते हुए प्रति किलो 10 रुपये की मामूली बढ़ोतरी की गई है। इसके चलते वर्तमान में लोग मात्र 110 रुपये प्रति किलो के हिसाब से यह स्वादिष्ट जलेबी खरीद पा रहे हैं। खुले बाजार में जहां सामान्य जलेबी 140 से 200 रुपये प्रति किलो तक बिकती है, वहीं इतनी कम कीमत पर बेहतरीन गुणवत्ता मिलना लोगों को और आकर्षित करता है।

हरदा गांव की इस लक्ष्मी पूजा का इतिहास भी काफी पुराना और दिलचस्प है। कभी साहा और मंडल परिवार की निजी पूजा हुआ करती थी, जो समय के साथ एक बड़े सार्वजनिक उत्सव में बदल गई। इस पूजा के केंद्र में ही गांव में एक स्थायी लक्ष्मी मंदिर का निर्माण भी किया गया है। आश्विन मास की कोजागरी पूर्णिमा के दिन से इस उत्सव की शुरुआत होती है। प्रतिपदा की सुबह पूजा संपन्न होती है, कृष्ण तृतीया को घट विसर्जन और कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इसके बाद मां की मूर्ति के ढांचे को सुरक्षित रख लिया जाता है और अगले साल उसी पुराने ढांचे पर नई प्रतिमा तैयार की जाती है। इस पूरे अनुष्ठान के दौरान लगभग 15 दिनों तक लगातार जलेबी की बिक्री चलती है। हालांकि, यह इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण जरूर है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस जलेबी को मां लक्ष्मी या सरस्वती को भोग के रूप में नहीं चढ़ाया जाता है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से मेले का मुख्य आकर्षण भर है।

झाड़ग्राम जिले के विभिन्न हिस्सों के अलावा बांकुड़ा, पुरुलिया और पश्चिम मिदनापुर से भी बड़ी संख्या में लोग इस मेले में पहुंचते हैं। इतना ही नहीं, पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से भी तमाम पर्यटक और शौकीन इस अनोखी जलेबी का लुत्फ उठाने हरदा गांव आते हैं। झाड़ग्राम घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह मेला अब एक मुख्य आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

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