दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सहमति वाले पॉक्सो केस होंगे अब रद्द!

दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, सहमति वाले पॉक्सो केस होंगे अब रद्द!

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट से जुड़े मामलों में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के संबंध में नए और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस अनुप जैराम भांभानी की पीठ ने कहा कि कानून के तहत किसी मामले को रद्द करना अवैध नहीं है, लेकिन अदालतों को ऐसे फैसलों में अत्यधिक सावधानी और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। यह निर्णय मुख्य रूप से उन मामलों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जहां कानूनी रूप से पीड़ित (de-juré victim) लड़की अपनी पूर्ण सहमति से शादी या संबंधों की बात स्वीकार करती है।

सावधानीपूर्वक मूल्यांकन के निर्देश

अदालत ने स्पष्ट किया है कि एफआईआर रद्द करने की किसी भी याचिका पर सुनवाई करते समय कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा कि पीड़ित लड़की किसी दबाव या धोखे में तो नहीं है। निर्णय लेने से पहले अदालत को यह जांचना होगा कि लड़की की ‘नो-ऑब्जेक्शन’ सहमति वास्तव में उसकी इच्छा है या कानूनी प्रक्रिया से बचने का कोई छलावा। साथ ही, यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या यह समझौता वास्तविक है या महज किसी अपराधी को बचाने का माध्यम। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में धोखे और बेईमानी की संभावनाओं के प्रति सतर्क रहना न्याय के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मामलों के निपटारे के लिए आधार

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मामलों को रद्द करने पर विचार करते समय कुछ प्रमुख तथ्यों का आकलन अनिवार्य है। इसमें दोनों पक्षों के बीच लिव-इन पार्टनर के रूप में रहने की अवधि, उनके बच्चों का भविष्य, अपराधी पर हिंसा या क्रूरता के आरोप और घटना के समय दोनों पक्षों की आयु जैसे बिंदु शामिल हैं। इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पॉक्सो एक्ट के तहत कार्यवाही केवल तभी प्रभावित हो, जब वह वास्तव में सामाजिक और व्यक्तिगत कल्याण के हित में हो।

एक नजर में

  • दिल्ली हाई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत आपराधिक केस रद्द करने के लिए नए सिद्धांत तय किए।
  • अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिकायत वापस लेने वाली नाबालिग लड़की किसी दबाव या धोखे में न हो।
  • अपराधी को बचाने के लिए किए गए फर्जी समझौतों के प्रति कोर्ट को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
  • केस रद्द करते समय पक्षों के वैवाहिक रिश्ते, बच्चों के भविष्य और घटना के समय आयु जैसे बिंदुओं पर गौर करना अनिवार्य होगा।

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