29 साल बाद मिला न्याय और बिजली विभाग की लापरवाही पर लगा 26 लाख का जुर्माना!

उत्तर प्रदेश के आगरा में करीब तीन दशक पहले हुए एक दर्दनाक हादसे के पीड़ित को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहत प्रदान की है। साल 1997 में महज सात साल की उम्र में बिजली की हाई-वोल्टेज लाइन की चपेट में आने से अपने दोनों हाथ गंवाने वाले पप्पू को अदालत ने 26.65 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड को इस घटना के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए ट्रायल कोर्ट के 2005 के उस पुराने फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें मुआवजे की मांग को खारिज कर दिया गया था।
लापरवाही की भारी कीमत और कोर्ट की फटकार
यह हादसा आगरा के नगला पाड़ी इलाके में एक प्राइमरी स्कूल के पास हुआ था, जहां बिना किसी सुरक्षा घेरे के 11 हजार वोल्ट का ट्रांसफॉर्मर लगा हुआ था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर बिजली के उपकरणों की सुरक्षा सुनिश्चित करना विभाग की जिम्मेदारी है। ट्रायल कोर्ट द्वारा पहले बच्चे को ही जिम्मेदार ठहराने के तर्क को हाई कोर्ट ने अनुचित माना। अदालत ने बिजली बोर्ड को न केवल मुआवजे की राशि, बल्कि 1997 से अब तक का 6 प्रतिशत सालाना ब्याज और मुकदमेबाजी का पूरा खर्च भी वहन करने का निर्देश दिया है।
अधिकारों की रक्षा और भविष्य का प्रभाव
इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ने की उम्मीद है, क्योंकि यह सरकारी विभागों की जवाबदेही तय करता है। हाई कोर्ट ने बिजली बोर्ड को आदेश दिया है कि एक महीने के भीतर पूरी धनराशि जमा की जाए। यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं होता है, तो याचिकाकर्ता को वसूली की कानूनी कार्यवाही शुरू करने का अधिकार होगा। 29 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद आया यह निर्णय उन नागरिकों के लिए एक मिसाल है जो तंत्र की लापरवाही के कारण अपंगता या अन्य गंभीर क्षति का सामना करते हैं।
एक झलक में
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 29 साल पुराने बिजली हादसे के पीड़ित को 26.65 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
- बिजली विभाग को 1997 से अब तक की राशि पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज और केस का खर्च भी देना होगा।
- साल 1997 में आगरा में बिना कवर वाले ट्रांसफॉर्मर की चपेट में आने से सात साल के बच्चे ने दोनों हाथ गंवा दिए थे।
- कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसने घटना के लिए बच्चे की लापरवाही को जिम्मेदार माना था।
