बिना खून बहाए दी जाती है बकरे की बलि! 1900 साल पुराने मां मुंडेश्वरी मंदिर के रहस्य देख हैरान रह जाएंगे आप

बिना खून बहाए दी जाती है बकरे की बलि! 1900 साल पुराने मां मुंडेश्वरी मंदिर के रहस्य देख हैरान रह जाएंगे आप

बिहार के कैमूर जिले की पावन पावन धरा पर स्थित पंवरा पहाड़ी पर मां मुंडेश्वरी का सुप्रसिद्ध मंदिर विराजमान है। करीब 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह पावन धाम न केवल एक महान शक्तिपीठ है, बल्कि यह भारत का सबसे पुराना और निरंतर पूजा-अर्चना वाला ‘जीवित मंदिर’ भी माना जाता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक अध्ययनों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण करीब 108 ईस्वी में हुआ था। तब से लेकर आज तक, यानी पिछले 1900 से अधिक वर्षों से यहां पूजा-पाठ की परंपरा बिना किसी बाधा के लगातार चली आ रही है। स्थापत्य कला और असीम धार्मिक आस्था—दोनों ही दृष्टिकोणों से यह स्थान बेहद अद्भुत और विशेष माना जाता है।

मां मुंडेश्वरी मंदिर की वास्तुकला अत्यंत अद्वितीय और दर्शनीय है। यह एक दुर्लभ अष्टकोणीय (आठ कोनों वाला) मंदिर है, जिसकी दीवारों पर उकेरी गई प्राचीन शिल्पकला और नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में मां मुंडेश्वरी की अष्टभुजा वाली दिव्य प्रतिमा स्थापित है। श्रद्धालु अपनी रक्षा, सुख-समृद्धि और सिद्धि प्राप्ति की मनोकामना लेकर माता के दर्शन करने दूर-दूर से आते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां मुंडेश्वरी को वाराही देवी के रूप में पूजा जाता है, इसलिए उनका वाहन महिष (भैंसा) है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां देवी शक्ति के साथ-साथ भगवान शिव की भी पूजा होती है। गर्भगृह में एक प्राचीन पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है, जिसके कारण यह स्थान शैव और शाक्त दोनों संप्रदायों के लिए समान रूप से पवित्र और महत्वपूर्ण है।

इस रहस्यमयी और प्राचीन मंदिर में होने वाली बलि प्रथा पूरी दुनिया में अनोखी और चमत्कारी मानी जाती है। यहां बकरे की सात्विक बलि दी जाती है, जिसमें किसी भी जीव का खून नहीं बहाया जाता। जब भक्त बलि के लिए बकरा लाते हैं, तो पुजारी माता के चरणों से अक्षत (चावल) और जल लेकर बकरे पर छिड़कते हैं। ऐसा करते ही बकरा तत्काल बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ता है। पूजा और आरती संपन्न होने के बाद जब दोबारा बकरे पर अक्षत और जल छिड़का जाता है, तो वह तुरंत उठ खड़ा होता है और उसे सकुशल जीवित छोड़ दिया जाता है। इसके अलावा, मंदिर में स्थापित पंचमुखी शिवलिंग को लेकर भी यह मान्यता है कि सूरज की किरणों और समय के साथ इसका रंग बदलता रहता है।

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा का उल्लेख हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ ‘दुर्गा सप्तशती’ में मिलता है। कथा के अनुसार, जब भगवती ने असुर चंड का वध कर दिया, तो उसका भाई मुंड भयभीत होकर इसी पंवरा पहाड़ी के पीछे जाकर छिप गया था। मां दुर्गा ने उग्र रूप धारण कर इसी पहाड़ी पर मुंड का संहार किया था, जिसके कारण उन्हें ‘मुंडेश्वरी’ नाम से पूजा जाने लगा। पहाड़ी की ऊंचाई तक पैदल पहुंचने के लिए लगभग 500 से 600 सीढ़ियों का निर्माण किया गया है, जबकि वाहनों के लिए सड़क मार्ग भी उपलब्ध है। हर साल बसंत पंचमी, नवरात्रि और महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यहां लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है।

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