लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल गिरा, अब 2029 में लागू होना मुश्किल!

संसद के विशेष सत्र में सरकार को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल लोकसभा में बहुमत न मिलने के कारण गिर गया। सदन में उपस्थित 528 सांसदों में से बिल के पक्ष में केवल 298 वोट पड़े, जबकि इसे पारित करने के लिए 352 वोटों के विशेष बहुमत की आवश्यकता थी। बिल के विफल होने के बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य दो विधेयक—परिसीमन संशोधन और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन बिल—वोटिंग के लिए पेश ही नहीं किए।
विपक्ष का विरोध और मुख्य कारण
इस बिल का गिरना महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ी बाधा माना जा रहा है। विपक्ष ने मुख्य रूप से परिसीमन के प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। विपक्षी दलों का तर्क है कि नई जनगणना के आधार पर परिसीमन होने से दक्षिण भारतीय राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, जो उनके अनुसार संघीय ढांचे के खिलाफ है। इसके अलावा, ओबीसी और एससी-एसटी आरक्षण के भीतर कोटे की मांग को लेकर भी गतिरोध बना रहा।
आरक्षण लागू होने में देरी की संभावना
संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, इस तरह के संशोधन के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत अनिवार्य है और इसमें संयुक्त सत्र (Joint Session) का कोई विकल्प नहीं होता। अब जबकि यह बिल गिर चुका है, 2023 में बना मूल ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ ही प्रभावी रहेगा। इसका सीधा अर्थ है कि महिला आरक्षण अब अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बिना लागू नहीं हो पाएगा। जानकारों के अनुसार, अब 2029 के लोकसभा चुनावों में 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना लगभग असंभव है और यह 2034 या उसके बाद के चुनावों तक टल सकता है।
सरकार के पास आगे के विकल्प
सरकार के पास अब सीमित विकल्प बचे हैं। वह आगामी सत्रों में विपक्षी दलों के साथ आम सहमति बनाकर संशोधित बिल दोबारा पेश कर सकती है। यदि सरकार दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं और आरक्षण के भीतर कोटे की मांगों पर विचार करती है, तो भविष्य में इसे पारित कराना आसान हो सकता है। फिलहाल, 2029 के चुनाव पुरानी व्यवस्था और 543 सीटों पर ही होने की संभावना है।
एक झलक में
- लोकसभा में बहुमत के अभाव में 131वां संविधान संशोधन बिल गिर गया, पक्ष में केवल 298 वोट पड़े।
- संयुक्त सत्र का प्रावधान न होने के कारण अब सरकार को दोबारा बिल पेश करना होगा।
- 2029 के लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू होने की संभावना अब बेहद कम है।
- परिसीमन को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं बिल के विफल होने का मुख्य कारण बनीं।
