दोलग्याल साधना विवाद से तिब्बती समाज दो ध्रुवों पर
तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा द्वारा दोलग्याल साधना को “समाज विरोधी” बताने के बाद यह प्राचीन परंपरा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। डोरजे शुगदेन नामक रक्षक देवता की यह साधना, मुख्यतः गेलुग्पा संप्रदाय से जुड़ी है, जिसे कुछ अनुयायी अपनी धार्मिक अस्मिता और परंपरा का प्रतीक मानते हैं। वहीं दलाई लामा के अनुसार यह साधना तिब्बती बौद्ध धर्म के भीतर गहरे मतभेद और असहिष्णुता को बढ़ावा देती है।
1996 में दलाई लामा द्वारा इसके सार्वजनिक विरोध के बाद समाज में दो स्पष्ट ध्रुव बन गए—एक ओर वे जो इस साधना को त्याग चुके हैं, और दूसरी ओर वे जो इसे छोड़ना अपनी पहचान से अलगाव मानते हैं। इस मतभेद ने न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी कई तिब्बती परिवारों को गहरे संघर्ष में डाल दिया है। “हमने अपने विश्वास के कारण सब कुछ खो दिया,” एक बुजुर्ग साधिका ने रोते हुए दलाई लामा के कार्यक्रम में कहा, जो समाज में फैले तनाव का प्रतीक बन गया।
चीन ने भी इस विवाद को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की है। डोरजे शुगदेन अनुयायियों को समर्थन देकर वह दलाई लामा की निर्वासित सरकार की वैधता को चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दोलग्याल साधना का यह विवाद केवल एक धार्मिक टकराव नहीं, बल्कि तिब्बती अस्मिता, स्वतंत्रता और राजनीतिक भविष्य से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न बन गया है।
