डिलिमिटेशन बिल 2026 से क्या बदल जाएगा देश का सियासी समीकरण!

डिलिमिटेशन बिल 2026 से क्या बदल जाएगा देश का सियासी समीकरण!

केंद्र सरकार का नया डिलिमिटेशन बिल भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। वर्षों से लंबित सीटों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की तैयारी है, जिसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इसमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें निर्धारित की जा सकती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है।

सीटों का विस्तार और महिला आरक्षण इस बिल का एक क्रांतिकारी पहलू महिला आरक्षण है। सरकार की योजना है कि 2034 का इंतजार करने के बजाय 2029 के लोकसभा चुनाव से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी जाएं। इस पूरी प्रक्रिया के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक शक्तिशाली आयोग का गठन किया जाएगा। आयोग द्वारा तय की गई सीमाओं को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी, जिससे इस प्रक्रिया को पूर्ण वैधानिक सुरक्षा प्राप्त होगी।

दक्षिण के राज्यों की चिंता इस बदलाव ने विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों में चिंता पैदा कर दी है। इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है, जबकि उत्तर भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। यदि सीटों का बंटवारा विशुद्ध रूप से जनसंख्या के आधार पर होता है, तो संसद में उत्तर भारत का राजनीतिक दबदबा बढ़ जाएगा और दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ सकता है। यह क्षेत्रीय असंतुलन भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

एक नज़र में

  • लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का लक्ष्य रखा गया है।
  • 2029 के चुनावों से ही 33% महिला आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव है।
  • जनसंख्या वृद्धि के आधार पर उत्तर भारतीय राज्यों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ने की संभावना।
  • बेहतर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले दक्षिणी राज्य राजनीतिक महत्व घटने को लेकर आशंकित हैं।