अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे शिवराज! मध्य प्रदेश में अस्पताल कांड और आदिवासी विवाद से BJP में बड़ा विद्रोह?

अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे शिवराज! मध्य प्रदेश में अस्पताल कांड और आदिवासी विवाद से BJP में बड़ा विद्रोह?

मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के भीतर मचा घमासान अब खुलकर सड़कों पर आ गया है। राज्य के एक प्रमुख सरकारी अस्पताल में नवजात शिशुओं की संदिग्ध मौतों और आदिवासियों के कथित जबरन विस्थापन को लेकर न केवल विपक्ष, बल्कि खुद सत्ताधारी पार्टी के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी फूट पड़ा है। मध्य प्रदेश के चार बार मुख्यमंत्री रह चुके और वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने ही संसदीय क्षेत्र विदिशा में राज्य सरकार की प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ आदिवासियों के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेकर हर किसी को हैरान कर दिया है।

आरोप है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाला प्रशासन विदिशा में आदिवासियों की जमीनों पर जबरन कब्जा कर रहा है और उन्हें बेदखल करने के लिए उनके मकान ढहा दिए गए हैं। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार के इस फैसले को खुले तौर पर गलत ठहराया है। राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने के बावजूद मध्य प्रदेश में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले शिवराज के इस कदम से बीजेपी आलाकमान की चिंता बढ़ गई है। केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का अपनी ही राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन में शामिल होना पार्टी के भीतर गहराते शक्ति संतुलन और अंदरूनी कलह को उजागर करता है।

दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के सरकारी अस्पताल के विशेष नवजात देखभाल इकाई (SNCU) में पिछले छह महीनों के भीतर कम से कम 80 नवजात शिशुओं की मौत के सनसनीखेज खुलासे ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। स्थानीय बीजेपी विधायक दिनेश राय मुनमुन ने अस्पताल प्रशासन और डॉक्टरों की घोर लापरवाही का आरोप लगाते हुए इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। हालांकि अस्पताल प्रशासन कम वजन और समय से पहले जन्म को वजह बता रहा है, लेकिन विधायक का स्पष्ट आरोप है कि रात के समय अस्पताल में डॉक्टरों की तैनाती ही नहीं होती। मोहन यादव के नेतृत्व को लेकर राज्य में जन आक्रोश और पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी लगातार बढ़ रही है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में नए और कम अनुभवी मुख्यमंत्रियों की कार्यशैली से उत्पन्न हुई इस असहज स्थिति के बाद अब संगठन के भीतर से ही नेतृत्व परिवर्तन की मांग जोर पकड़ने लगी है।

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