12 साल में पहली बार संसद में हारी मोदी सरकार, गिर गया संविधान संशोधन बिल!

12 साल में पहली बार संसद में हारी मोदी सरकार, गिर गया संविधान संशोधन बिल!

भारतीय संसदीय इतिहास में 17 अप्रैल 2026 की तारीख एक बड़े उलटफेर के रूप में दर्ज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को पिछले 12 वर्षों में पहली बार लोकसभा के भीतर किसी विधेयक पर सीधी हार का सामना करना पड़ा। सरकार द्वारा लाया गया ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026’ सदन में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में विफल रहा। इस बिल के गिरने के तुरंत बाद सरकार को परिसीमन से जुड़े दो अन्य महत्वपूर्ण विधेयक भी वापस लेने पड़े।

हार का गणित और तकनीकी पेच

संविधान संशोधन के लिए सदन में विशेष बहुमत की आवश्यकता थी, लेकिन वोटिंग के दौरान सरकार आंकड़े जुटाने में पीछे रह गई। सदन में मौजूद 528 सांसदों में से बिल के पक्ष में केवल 298 वोट पड़े, जबकि इसे पास कराने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी। विपक्ष के एकजुट विरोध और 230 नकारात्मक वोटों के कारण सरकार लक्ष्य से 54 वोट दूर रह गई। विपक्ष ने इस बिल को दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व के साथ खिलवाड़ और चुनावी लाभ के लिए सीटों की ‘मैथमेटिकल जेरीमैंडरिंग’ करार दिया।

महिला आरक्षण पर भविष्य का संकट

इस विधायी हार का सबसे बड़ा प्रभाव ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के क्रियान्वयन पर पड़ेगा। सरकार इस संशोधन के जरिए 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर 2029 के चुनावों में ही 33% महिला आरक्षण लागू करना चाहती थी। अब बिल के गिर जाने से यह प्रक्रिया काफी लंबी खिंच गई है। अब नियमानुसार नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही आरक्षण संभव हो पाएगा, जिसके चलते इसके पूरी तरह लागू होने की उम्मीद अब 2033-2034 तक टल गई है।

राजनीतिक असर और भविष्य की रणनीति

इस घटनाक्रम ने देश के सियासी विमर्श को पूरी तरह बदल दिया है। जहां विपक्ष इसे संघवाद और संविधान की जीत बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष ने इसे राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी कर ली है। सरकार अब इस हार को जनता के बीच ले जाकर विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ और ‘दलित-आदिवासी विरोधी’ के रूप में पेश करने की योजना बना रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा चुनावी रैलियों में प्रमुखता से गूंजेगा, जिससे नए सिरे से सियासी ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ गई है।

एक झलक में

  • लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिरने से मोदी सरकार को 12 साल में पहली बार विधायी हार मिली।
  • विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जो आवश्यक 352 के आंकड़े (दो-तिहाई बहुमत) से 54 कम थे।
  • बिल का उद्देश्य लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करना और 2029 से पहले महिला आरक्षण लागू करना था।
  • विपक्ष के विरोध के बाद सरकार को परिसीमन से जुड़े दो अन्य विधेयक भी वापस लेने पड़े।