PoK विवाद: कांग्रेस की चुप्पी से बिगड़ी भारत की स्थिति

नई दिल्ली — पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को लेकर देश में एक बार फिर राजनीतिक और सामरिक बहस तेज़ हो गई है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी ने अपने पुराने रुख को दोहराया, वहीं कांग्रेस भी पहली बार इस विषय पर खुलकर बोलती नजर आई। किंतु यह आश्चर्यजनक है कि जिस मुद्दे को दशकों तक कांग्रेस ने गंभीरता से नहीं लिया, अब वही पार्टी इसे राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना रही है।

इतिहास के पन्ने पलटें तो स्पष्ट होता है कि PoK की वर्तमान स्थिति कांग्रेस की लंबे समय तक चली निष्क्रियता और गलत निर्णयों का परिणाम है। 1947 में पाकिस्तानी घुसपैठ के बाद भारत ने सैन्य कार्रवाई की थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने युद्धविराम की घोषणा कर संयुक्त राष्ट्र का रुख किया, जिससे सेना को पीछे हटना पड़ा। यही निर्णय भारत के दावे को कमजोर करने की पहली बड़ी भूल बना। इसके बाद भी 1957 में मीरपुर-हवेली जनविद्रोह, 1970 के प्रदर्शन, और 2010 में चीन की सैन्य मौजूदगी जैसे कई मौके भारत के पक्ष में थे, जिन्हें कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों ने गंवा दिया।

आज PoK सिर्फ एक संवेदनशील कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक जटिल सामरिक चुनौती भी बन चुका है। चीन-पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी, गिलगित-बाल्टिस्तान में चीनी सैनिकों की मौजूदगी और CPEC जैसी परियोजनाएं भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि यदि कांग्रेस ने समय रहते ठोस कदम उठाए होते, तो क्या आज स्थिति कुछ और होती?