बीवी-बच्चों का खर्च नहीं उठा सकते तो शादी न करें! हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के एक मामले में पति की याचिका खारिज करते हुए बेहद सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जो पुरुष यह महसूस करते हैं कि वे वैवाहिक विवाद की स्थिति में अपनी पत्नी और बच्चों का आर्थिक बोझ नहीं उठा सकते, उन्हें शादी के बंधन में बंधना ही नहीं चाहिए।
कानूनी अनिवार्यता और जिम्मेदारी
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विवाह के बाद पत्नी का भरण-पोषण करना पति की केवल सामाजिक नहीं बल्कि कानूनी बाध्यता है। कोर्ट के अनुसार, एक बार शादी हो जाने के बाद पति अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता। कानून के तहत परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना अनिवार्य है।
इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा, खासकर उन मामलों में जहां पति आर्थिक तंगी का बहाना बनाकर मेंटेनेंस देने से बचते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति को अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल करनी ही होगी।
एक झलक में
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस केस में पति की याचिका को किया खारिज।
- आर्थिक रूप से अक्षम पुरुषों को शादी न करने की दी सलाह।
- पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करना पति की कानूनी बाध्यता करार।
- कमाने में सक्षम पति वित्तीय तंगी का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
