ऐतिहासिक अवसर चूका! आधी रात को हुई वोटिंग में महिला आरक्षण बिल फिर हुआ विफल

भारतीय महिलाओं का राजनीति में ३३ प्रतिशत भागीदारी का दशकों पुराना सपना एक बार फिर टूट गया है। १७ अप्रैल की आधी रात तक लोकसभा में चली तीखी बहस के बाद, यह विधेयक आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण गिर गया। सरकार ने वर्तमान सदस्यों के हितों की रक्षा करते हुए लोकसभा सीटों को ५४৩ से बढ़ाकर ८१५ करने की योजना बनाई थी, ताकि महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले। हालांकि, पक्ष में २९८ और विपक्ष में २३० वोट पड़ने के कारण दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा नहीं छूआ जा सका।
तीस साल का राजनीतिक गतिरोध साल १९९६ में देवेगौड़ा सरकार के समय शुरू हुआ यह संघर्ष ३० साल बाद भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका है। इससे पहले वाजपेयी सरकार ने भी चार बार प्रयास किया था, लेकिन तब कुछ क्षेत्रीय दलों के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो पाया। २०१० में राज्यसभा से पारित होने के बावजूद तत्कालीन सरकार ने इसे लोकसभा में पेश नहीं किया। वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि महिला आरक्षण का मुद्दा आज भी राजनीतिक दलों के लिए केवल एक चुनावी बिसात बनकर रह गया है।
प्रभाव और भविष्य की राह भारत के २० से अधिक राज्यों में महिलाएं स्थानीय निकायों का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रही हैं। इसके बावजूद, देश की सर्वोच्च कानून बनाने वाली संस्थाओं में उन्हें जगह देने पर राजनीतिक हिचकिचाहट बरकरार है। पिछले १० वर्षों में महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार तो आया है, लेकिन राजनीतिक अधिकारों की यह हार उनके सशक्तिकरण में एक बड़ी बाधा है। हालांकि, माना जा रहा है कि यह विफलता केवल अस्थायी है और भविष्य में महिलाओं की आवाज और बुलंद होगी।
एक झलक में
- १७ अप्रैल की आधी रात को लोकसभा में ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण बिल दो-तिहाई बहुमत की कमी से गिर गया।
- बिल के समर्थन में २९८ और विरोध में २३০ वोट पड़े।
- सरकार ने लोकसभा सीटों को ५४৩ से बढ़ाकर ८१५ करने का प्रस्ताव रखा था।
- १९९६ से लंबित यह विधेयक राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ३० साल बाद भी अधूरा है।
