तलाक समझौते के बाद सहमति वापस लेना संभव नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से तलाक के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद कोई भी पक्ष अपनी सहमति से पीछे नहीं हट सकता। न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि समझौते के बाद ‘यू-टर्न’ लेना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
मध्यस्थता पर अदालत का रुख
अदालत ने जोर देकर कहा कि यदि यह साबित नहीं होता कि समझौता धोखाधड़ी या जबरदस्ती के तहत किया गया है, तो दोनों पक्षों को इसकी शर्तों का पालन करना होगा। न्यायाधीशों के अनुसार, अदालत द्वारा अनुमोदित मध्यस्थता से पीछे हटने की प्रवृत्ति न्याय प्रणाली की गरिमा को ठेस पहुंचाती है। बिना किसी ठोस कारण के मुकरने वालों पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दिल्ली के एक दंपत्ति से जुड़ा है जिनकी शादी के 20 साल बाद विवाद शुरू हुआ था। मध्यस्थता के जरिए समझौता होने के बावजूद पत्नी ने बाद में अपनी सहमति वापस ले ली और पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानून का दुरुपयोग बताते हुए मामले को खारिज कर दिया। इस फैसले से भविष्य में वैवाहिक विवादों के शीघ्र समाधान में मदद मिलेगी।
एक झलक में
तलाक के समझौते पर हस्ताक्षर के बाद सहमति वापस लेने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई।
धोखाधड़ी या दबाव साबित न होने पर समझौते की शर्तों को मानना अनिवार्य है।
कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है।
दिल्ली के एक मामले में पति-पत्नी के बीच हुए समझौते को कोर्ट ने बरकरार रखा।
